पौराणिक कथाओं के अनुसार कावड़ यात्रा की शुरुआत समुद्र मंथन के समय भगवान शिव द्वारा हलाहल विष पीने और उसकी गर्मी को शांत करने के लिए देवताओं द्वारा गंगाजल अर्पित करने से जुड़ी है। इसके अलावा रावण, भगवान परशुराम, भगवान राम और श्रवण कुमार की कथाएं भी इसकी शुरुआत के मुख्य दावे माने जाते हैं।
प्रमुख पौराणिक मान्यताएं
समुद्र मंथन (विष पान): शिव जी ने संसार की रक्षा के लिए विष पिया था। उनकी जटाओं और शरीर में विष की उष्णता को शांत करने के लिए देवताओं ने गंगाजल से उनका अभिषेक किया।
रावण की भक्ति: त्रेता युग में रावण ने कावड़ में गंगाजल भरकर पैदल यात्रा की और पुरा महादेव मंदिर में शिव जी का जलाभिषेक किया।
भगवान परशुराम: परशुराम ने मातृवध के पाप से मुक्ति पाने के लिए गढ़मुक्तेश्वर से गंगाजल लाकर शिव जी का जलाभिषेक किया।
श्रवण कुमार: श्रवण कुमार ने अपने अंधे माता-पिता को कावड़ में बैठाकर तीर्थ यात्रा कराई थी, जिससे सेवा और यात्रा के इस रूप को बल मिला।
भगवान राम: प्रभु राम ने बिहार के सुल्तानगंज से गंगाजल उठाकर झारखंड के देवघर में वैद्यनाथ धाम के शिवलिंग पर अर्पित किया था।
यात्रा का स्वरूपभक्त (कांवड़िए) भगवा वस्त्र पहनकर हरिद्वार, गंगोत्री, सुल्तानगंज जैसे पवित्र स्थलों से गंगाजल भरकर पैदल अपने स्थानीय शिव मंदिरों में लाते हैं।इस दौरान कांवड़ को जमीन पर नहीं रखा जाता और कड़े अनुशासन व नियमों का पालन किया जाता है।
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